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अमरगढ़ का इतिहास

अमरगढ़ डिंडौरी जिले के अमरपुर विकासखंड में स्थित है। अमरगढ़ का वर्तमान नाम रामगढ़ है। यह महाराजा संग्रामशाह के 52 गढ़ों में से एक था। राजा निजामशाह के शासनकाल तक यह गढ़ गढ़ा मण्डला राज्य का हिस्सा रहा है। राजा निजाम शाह के शासनकाल में गढ़ा से मोहनसिंह लोधी और मुकटमन लोधी नाम के दो भाई मण्ड़ला आये थे। उस समय निजाम शाह की राजधानी मण्डला थी। मोहनसिंह और मुकटमन दोनों बहुत बहादुर युवक थे। इसलिये दोनों को मण्डला राज्य की राजधानी में सेवा का अवसर मिला। इन्हें रामनगर के पास बिद्दी के जंगल में एक आदमखोर शेर को मारने का आदेश मिला। मुकटमन को शेर के लिये चारा बनाकर रखा गया और मोहनसिंह मचान पर घात लगाकर बैठ गया। शेर ने मुकटमन पर आक्रमण किया, उसी समय मोहनसिंह शेर पर गोली चला दिया और शेर बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ा। शेर को मरा समझकर मुकटमन शेर के पास गया। अचानक घायल शेर मुकटमन पर आक्रमण कर दिया अौर मुकटमन को मार डाला। मोहनसिंह ने दूसरी गोली दागकर शेर‍ को मार दिया। इन्हीं मोहनसिंह लोधी के पुत्र गाजीसिंह को निजामशाह ने बाद में रामगढ़ का राजा बना दिया।

मराठा शासनकाल में गाजीसिंह का पुत्र लक्ष्मण सिंह मण्डला किले में दुर्गरक्षक के पद पर तैनात था। लक्ष्मंणसिंह के पुत्र विक्रमजीत सिंह अंग्रेजी शासनकाल में लार्ड डलहौजी के समय रामगढ़ के राजा थे। इनकी पत्नी रानी अवंती बाई थीं।

राजा विक्रमजीत अचानक मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गये। इस वजह से रानी अवंती बाई ने राज्य का संचालन करने लगीं। परंतु अंग्रेजों को यह बात अच्छी नहीं लगी और वे सन् 1855 में रामगढ़ राज्य को कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अंतर्गत कर दिये तथा एक व्यवस्थापक/प्रशासक की नियुक्ति कर दिया गया। रानी को रामगढ़ राज्य की रक्षा के लिये अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत करना आवश्यक हो गया था। रानी अवंती बाई का स्थानीय जागीरदारों और मालगुजारों के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ यह संघर्ष लंबे समय तक चलता रहा। रानी अवंतीबाई की सेना ने देवहारगढ़ की पहाडि़यों के निकट मोर्चा लगाया गया। युद्ध के दौरान 20 मार्च 1858 को रानी अवंती बाई लोधी दुश्मन सेना से घिर गईं और उनका वापस जाना संभव नहीं था। इन परिस्थितियों में रानी अवंतीबाई ने दुश्मनों के हाथों गिरफतार होने से बेहतर महारानी दुर्गावती की तरह स्वयं को कटार मारकर जौहर करना उचित समझा। इस तरह वीरांगना अवंती बाई लोधी ने आत्म बलिदान दे दिया और इतिहास में उनका नाम अमर हो गया। रानी अवंतीबाई की समाधि डिंडौरी जिले में शाहपुर के पास बालपुर गांव में स्थित है।

रामगढ़ का किला अमरपुर के निकट से बहने वाली एक नदी के किनारे स्थित था। यह किला अब पूरी तरह से धराश्‍ाायी हो चुका है। प्रशासन के द्वारा कुछ भू-भाग को बाउंड्री वाॅल बनाकर संरक्षित करने का प्रयास किया गया है। संभवत: इस संरक्षित भू-भाग पर मुख्‍य किला रहा होगा। बाउंड्रीवाल के अंदर वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी की एक मूर्ति स्‍थापित की गई है। अमरपुर से रामगढ़ जाते समय एक श्‍मशान में कुछ समाधि बनी हुई हैं जो राजवंशाें की प्रतीत होती हैं।

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