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गढ़पहरा का इतिहास

यह महाराजा संग्रामशाह के 52 गढों में से एक गढ़ था। संग्राम शाह की मृत्यु के बाद यहां का राज्य दांगी राजपूतों के हाथों में चला गया। किंतु गढ़ा राजवंश के 57 वें शासक राजा नरेंद्रशाह के शासनकाल में गढ़पहरा गढ़ा राज्‍य का पुन: हिस्‍सा बन चुका था। अपने ही राजवंश के पहाड़सिंह के दोनों पुत्र अब्‍दुल रहमान और अब्‍दुल हाजी ने सत्‍ता हथियाने के लिए शाही सेना की मदद से गढ़ा राज्‍य पर आक्रमण कर दिये। युवा राजा नरेंद्रशाह ने शत्रुओं को परास्‍त करने के लिये ओरछा के राजा छत्रसाल और बख्‍त बुलंदशाह से सहायता मांगी। बख्‍त बुलंदशाह ने छत्रसाल की सैन्‍य सहायता मिलने से पहले ही अब्‍दुल रहमान, अब्‍दुल हाजी और अजीम खां को गंगई के युद्ध में मौत के घाट उतार दिया। इस सहायता के बदले में छत्रसाल को गढ़पहरा सहित हटा, रहली, खिमलासा और दमोह के किले दिये तथा बख्‍त बुलंदशाह को चौरई, डोंगरताल और घुंसार/घंसौर के किले दिये थे।

गढ़पहरा का किला सागर जिला में राष्ट्रीय राजमार्ग 26 से लगा हुआ एक पहाडी पर स्थित है। किले के प्रवेश द्वार से लगा हुआ एक सिद्ध हनुमान जी का मंदिर है। किला परिसर में कुछ दूरी तय करने पर एक बेहद आकर्षक शीशमहल मिलता है। इस शीशमहल का आकार मंदिरनुमा है। गढ़पहरा के मुख्य किला दो भागों में बंटा हुआ है। दोनों भागों में बहुत से कमरे बने हुए हैं जिनमें पत्थरों की शानदार मियालों का प्रयोग किया गया है। महल में लगे पत्थरों पर कारीगरों द्वारा नक्काशी की गई है। वर्तमान में किले के भग्‍नावशेष ही विद्यमान हैं। किला परिसर एवं किले के उपर से आसपास का दृश्‍य अत्‍यंत मनोरम होता है।

कहते हैं कि एक दुर्घटना में इस किले से स्टंट दिखाते समय एक नटिन की जान चली गई थी। जिस जगह पर गिरकर नटिन की जान चली गई थी, उसी जगह पर नटिन की समाधि बना दी गई थी। यह समाधि राजमार्ग के नजदीक बनी हुई है। स्‍थानीय लोगों का कहना है कि इस किले में नट और नटिन की आत्‍मा भटकती रहती है।

गढ़पहरा कैसे पहुंचें

सागर जिला मुख्‍यालय से सागर-झांसी मार्ग पर करीब 10 किलोमीटर तय करने पर गढ़पहरा मिलता है। किला एक पहाड़ी पर स्थित है। गढ़पहरा को पुराना सागर भी कहा जाता है। इसी मार्ग पर से होकर धामोनी जाते हैं।

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