Rahatgarh

Our History

Rahatgarh is located in Sagar district. The splendid Rahatgarh fort is built at a hill nearby Bina River. The Chandel and the Parmar rulers had ruled this place prior to Maharaja Sangram Shah. King Chandrashah, the successor of late queen Durgavati and Veernarayan, had to present 10 Garh to Mughal King Akbar in order to get the crown. Rahatgarh was one of those 10 Garha.

The design of the Rahatgarh fort is very special due to its security reasons. The gates are constructed like safety check post. One has to pass through many gates to enter in the fort. The ruins of security posts are seen on the outer boundary wall. The hill is high, and the specific structure of the fort allows aiming the invaders from a far distance. The fort is surrounded by thick high boundary walls where security posts are built. The south part of the fort is associated to the dreadful gulf. It seems impossible to enter this fort by climbing this gulf. It was extremely difficult to seize the Rahatgarh fort.

There are many beautiful buildings and monuments inside the fort campus. Some are made of bricks. Most of the buildings are built with stone. A pond is also available which is made by cutting and digging the huge rocks. Stairs were also made to get down to the water.

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राहतगढ़

राहतगढ़ का इतिहास

राहतगढ़ सागर जिले में स्थित है। बीना नदी के किनारे पहाड़ी पर एक विशाल एवं भव्य किला है। महाराजा संग्राम शाह के पूर्व यहां पर चंदेल और परमार शासकों ने शासन किया। महारानी दुर्गावती एवं वीरनारायण के मृत्योपरांत उनके उत्तराधिकारी राजा चंद्रशाह को गोंडवाना साम्राज्य के राजा बनाने के लिये अकबर को 10 गढ़ देने पड़े उनमें से एक राहतगढ़ भी था।

राहतगढ़ किले की बनावट सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। किले में दरवाजे सुरक्षा चैकपोस्ट की तरह बनाये गये हैं। किले में प्रवेश करने के लिये कई दरवाजों से होकर जाना पड़ता है। किले की बाहरी दीवारों के साथ सुरक्षा चौकियों के अवशेष भी दिखाई देते हैं। पहाड़ी बहुत उंची है और किले की बनावट ऐसी है कि आक्रमणकारियों को दूर से ही निशाना लगाया जा सके। किला उंची चहारदीवारी से घिरा हुआ है जिसमें सुरक्षा चौकियां बनी हुई हैं। किले के दक्षिण किनारा बीना नदी के भयावह खाई से लगा हुआ है। इस खाई से होकर किले में प्रवेश कर पाना असंभव प्रतीत होता है। इस खाई के किनारे भी सुरक्षा चौकियां निर्मित हैं। राहतगढ़ के इस किले पर विजय पाना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है।

किले के अंदर बहुत सी सुंदर इमारतें मौजूद हैं। कुछ इमारतों का निर्माण ईंट से किया गया है। अधिकांश इमारतों के निर्माण पत्थरों से किया गया है। चटृानों को काटकर यहां पर एक तालाब का निर्माण कराया गया था। इस तालाब में वर्ष पर्यंत पानी उपलब्धं रहता है। तालाब में उतरने के लिये सीढियां बनवाई गईं हैं।

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Garha

Our History

The Garha Kingdom was founded by king yadavarai. King Madan Singh (34th king), one of his successor built Madan Mahal fort located in Garha. King Madan Singh started governing the state in around 1116 CE. This fort was inherited by the King Sangram Shah. This fort has been built on a rock. Therefore, there is no tunnel or underground passage inside the fort. The rocky mountain and the forest make it easy to fight the invaders. The Gonds and local tribes were expert in Gorilla war. The huge rocks would have very helpful in attacking the enemies.

There are ruins of a fort nearby in the West of Madan Mahal Fort. Perhaps, this ruined fort was used to keep the army and artilleries. There is a water tank built inside the fort. It seems this water tank was used for a bath. The building is built with stones and bricks.

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गढ़ा

गढ़ा का इतिहास

गढ़ा में राजा यादवराय ने राज्य की नींव रखी थी। इनके वंशज राजा मदनसिंह (34वें राजा) गढ़ा में स्थित मदन महल बनवाये। राजा मदनसिंह करीब 1116 ई० से राज्यारंभ किये। यह किला महाराजा संग्रामशाह को विरासत में मिली थी। यह किला एक चट्टान के उपर बनाया गया है। इसलिये इस किले से बाहर जाने का कोई सुरंग या गुप्त दरवाजा नहीं है। किला विशालकाय चट्टानों वाली पहाड़ी पर बनाया गया है। जंगल और चट्टानों के मध्य किला होने के कारण यहां शत्रुओं से लोहा लेना आसान होता रहा होगा। गोंड़ और स्थानीय लोग गोरिल्ला युद्ध में माहिर होते थे। इस वजह से ये विशाल चट्टानें छुपकर वार करने में बेहद सहायक रही होंगी।

मदनमहल किला के ठीक पश्चिम में एक और किले के भग्‍नावशेष मौजूद हैं। संभवत: इस किले में सेना व सैन्य सामग्री रखी जाती रही होगी। इस किले में पानी का एक कुण्ड बना हुआ है। यह कुंड शायद स्नानागर रहा हो। इमारत का निर्माण पत्थरों एवं ईंटों से किया गया है।

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Amargarh

Our History

Amargarh is located in Amarpur Block of Dindori district. Amargarh is known as Ramgarh at present. It was one of the 52 Garha of Emperor Sangram Shah. This Garha was a part of Garha Mandla state till the reign of King Nijamshah. In the reign of King Nijamshah, Mohansingh Lodhi and Mukatman Lodhi from Garha came to Mandla. Mandla was the capital of the King Nijamshah those days. Mohansingh and Mukatman, both were very brave young men. Therefore, both young men got a chance to provide their services in the capital of Mandla state. They received an order to hunt a man-eater tiger in the forest of Biddi near Ramnagar. Mukatman was killed by the wounded tiger during the hunt. Mohansingh killed the tiger anyway. Gajisingh, the son of Mohansingh was crowned later as the King of Ramgarh by the Ruler Nijamshah.

Lakshman Singh, the son of Gajisingh was posted as ‘Durgrakshak’ at Mandla fort during the Maratha reign. Vikramjeet, son of Lakshman Singh was the King of Ramgarh during the British governance. His wife’s name was Avanti Bai.

King Vikramjeet suddenly got mentally ill. Hence, Queen Avanti Bai interacted with the British government to take up the affairs of the state. But, the British government did not give any chance to the Queen. It had become necessary for the Queen to revolt against the British government and for the safety of Ramgarh state. Queen Avanti Bai sacrificed her life while fighting against the Britishers. The graveyard of the Queen Avanti Bai Lodhi is located in Balpur near the Shahpur village of Dindori district.

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अमरगढ़

अमरगढ़ का इतिहास

अमरगढ़ डिंडौरी जिले के अमरपुर विकासखंड में स्थित है। अमरगढ़ का वर्तमान नाम रामगढ़ है। यह महाराजा संग्रामशाह के 52 गढ़ों में से एक था। राजा निजामशाह के शासनकाल तक यह गढ़ गढ़ा मण्डला राज्य का हिस्सा रहा है। राजा निजाम शाह के शासनकाल में गढ़ा से मोहनसिंह लोधी और मुकटमन लोधी नाम के दो भाई मण्ड़ला आये थे। उस समय निजाम शाह की राजधानी मण्डला थी। मोहनसिंह और मुकटमन दोनों बहुत बहादुर युवक थे। इसलिये दोनों को मण्डला राज्य की राजधानी में सेवा का अवसर मिला। इन्हें रामनगर के पास बिद्दी के जंगल में एक आदमखोर शेर को मारने का आदेश मिला। मुकटमन को शेर के लिये चारा बनाकर रखा गया और मोहनसिंह मचान पर घात लगाकर बैठ गया। शेर ने मुकटमन पर आक्रमण किया, उसी समय मोहनसिंह शेर पर गोली चला दिया और शेर बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ा। शेर को मरा समझकर मुकटमन शेर के पास गया। अचानक घायल शेर मुकटमन पर आक्रमण कर दिया अौर मुकटमन को मार डाला। मोहनसिंह ने दूसरी गोली दागकर शेर‍ को मार दिया। इन्हीं मोहनसिंह लोधी के पुत्र गाजीसिंह को निजामशाह ने बाद में रामगढ़ का राजा बना दिया।

मराठा शासनकाल में गाजीसिंह का पुत्र लक्ष्मण सिंह मण्डला किले में दुर्गरक्षक के पद पर तैनात था। लक्ष्मंणसिंह के पुत्र विक्रमजीत सिंह अंग्रेजी शासनकाल में लार्ड डलहौजी के समय रामगढ़ के राजा थे। इनकी पत्नी रानी अवंती बाई थीं।

राजा विक्रमजीत अचानक मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गये। इस वजह से रानी अवंती बाई ने राज्य का संचालन करने लगीं। परंतु अंग्रेजों को यह बात अच्छी नहीं लगी और वे सन् 1855 में रामगढ़ राज्य को कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अंतर्गत कर दिये तथा एक व्यवस्थापक/प्रशासक की नियुक्ति कर दिया गया। रानी को रामगढ़ राज्य की रक्षा के लिये अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत करना आवश्यक हो गया था। रानी अवंती बाई का स्थानीय जागीरदारों और मालगुजारों के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ यह संघर्ष लंबे समय तक चलता रहा। रानी अवंतीबाई की सेना ने देवहारगढ़ की पहाडि़यों के निकट मोर्चा लगाया गया। युद्ध के दौरान 20 मार्च 1858 को रानी अवंती बाई लोधी दुश्मन सेना से घिर गईं और उनका वापस जाना संभव नहीं था। इन परिस्थितियों में रानी अवंतीबाई ने दुश्मनों के हाथों गिरफतार होने से बेहतर महारानी दुर्गावती की तरह स्वयं को कटार मारकर जौहर करना उचित समझा। इस तरह वीरांगना अवंती बाई लोधी ने आत्म बलिदान दे दिया और इतिहास में उनका नाम अमर हो गया। रानी अवंतीबाई की समाधि डिंडौरी जिले में शाहपुर के पास बालपुर गांव में स्थित है।

रामगढ़ का किला अमरपुर के निकट से बहने वाली एक नदी के किनारे स्थित था। यह किला अब पूरी तरह से धराश्‍ाायी हो चुका है। प्रशासन के द्वारा कुछ भू-भाग को बाउंड्री वाॅल बनाकर संरक्षित करने का प्रयास किया गया है। संभवत: इस संरक्षित भू-भाग पर मुख्‍य किला रहा होगा। बाउंड्रीवाल के अंदर वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी की एक मूर्ति स्‍थापित की गई है। अमरपुर से रामगढ़ जाते समय एक श्‍मशान में कुछ समाधि बनी हुई हैं जो राजवंशाें की प्रतीत होती हैं।

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Madogarh

Our History

Madogarh is located in Narayanganj Block of Mandla district. This fort is completely ruined now. It was built on the top of a mountain. The local residents call it Garhi. The locals collected the stones used for building the fort and made a boundary wall. There is a sacred place of God Badadev exists inside the compound. Worship and rituals are performed timely by the reverent. Balai River flows through the Madogarh area and the soil is fertile too, so the crop production is good here.

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माड़ौगढ़

माड़ौगढ़ का इतिहास

माड़ौगढ गढ़ा राज्य का एक गढ़ था। महाराजा संग्रामशाह का ये गढ़ गांव से दूर जंगल में स्थित है। यहां का किला पूरी तरह से धराशायी हो चुका है। इस किले को एक पहाड़ी पर बनाया गया था। स्थाानीय लोग इसे गढ़ी के नाम से जानते हैं। किले के निर्माण में प्रयुक्त‍ पत्थरों को ग्रामीणों ने एकत्र करके चहारदीवारी बना दिया है। यहां पर भगवान बड़ादेव का स्थान भी है जहां पर श्रद्धालु समय-समय पर पूजा पाठ करते हैं। माड़ौगढ़ क्षेत्र में बालई नदी के गुजरने और उपजाउ मिट्टी होने से इस क्षेत्र में फसलों की पैदावार अच्छी होती है।

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