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रामनगर गढ़

रामनगर गढ़ का इतिहास

राजा प्रेमशाह/प्रेम नारायण की राजधानी चौरागढ़ तथा गढ़ा थी। मुगल सल्तनत के नियमानुसार राज-कौशल में दक्षता के लिए मुगल दरबार में शिक्षा अर्जन करना अनिवार्य था। अत: प्रेमशाह अपने ज्येष्‍ठ पुत्र हिरदे शाह को राज-कौशल की शिक्षा दिलाने के लिए मुगल दरबार अर्थात दिल्ली ले गये। राजा प्रेमशाह अपने पुत्र को दरबार में छोड़कर जल्दी वापस हो गये और ओरछा के राजा बीर सिंह देव के निमंत्रण को भूल गए। यह बात राजा बीर सिंह देव को अच्छी नहीं लगी और वे अपमानित महसूस करने लगे। मृत्यु के समय राजा बीर सिंह देव ने अपने पुत्र जुझारसिंह से वचन लिया कि वे गढ़ा राज्य को जीतकर इस अपमान का बदला चुकाऐं।

जुझारसिंह ने गढ़ा राज्य पर आक्रमण कर दिया और राजधानी गढ़ा को जीत लिया। राजा प्रेमशाह ने दूसरी राजधानी चौरागढ़ पर मोर्चा लगाया और यहां फिर से जमकर युद्ध हुआ। जुझारसिंह ने चौरागढ़ से हटकर थोड़ी दूरी पर अपना कैंप लगाया तथा प्रेमशाह तक स्वयं के द्वारा गढ़ा राज्य छोड़कर जाने एवं सुलह की बातचीत करने के लिये संदेश पहुंचवाया। राजा प्रेमशाह अपने गोंड़ पहरेदार के साथ जुझारसिंह के छावनी पर पहुंचे। जुझारसिंह ने तत्काल अपने सिपाहियों को राजा प्रेमशाह का सिर काटने का आदेश दिया और सैनिकों ने राजा पर आक्रमण कर मौत के घाट उतार दिये। लेकिन जुझारसिंह की यह खुशी अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी।

संदेशवाहकों ने दिल्ली जाकर हिरदे शाह से जुझारसिंह द्वारा किये गये विश्वासघात के इस कृत्य के संबंध में जानकारी दिये। हिरदेशाह अपने लोगों के सानिध्य में भोपाल आये और उनकी सहायता से सेना तैयार किये। पिता की हत्या का बदला लेने के लिए हिरदे शाह ने जुझारसिंह पर आक्रमण कर दिया और इस युद्ध में जुझारसिंह मारा गया। इस युद्ध में सहायता करने के बदले में हिरदेशाह ने भोपाल के उस शासक को ओपदगढ़ राज्य दे दिया। जुझारसिंह का भाई पहाड़सिंह दिल्ली के मुगल सल्तनत में एक उच्‍च पद पर अासीन था, अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए गढ़ा राज्य पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में मुगल सेना का पहाड़सिंह के साथ होने के कारण हिरदेशाह उन्हें परास्त नहीं कर पाया और रीवा राज्य में शरण लेना पड़ा था। इस घटना से बहुत आर्थिक क्षति हुई तथा मानसिक तकलीफ भी हुई। पहाड़सिंह वापस चला गया परंतु मानसिक दुख के कारण हिरदेशाह ने गढ़ा से देवगांव में स्थित जमदग्नि ऋषि के आश्रम तक तीर्थ यात्रा प्रारंभ किये। इस यात्रा के दौरान राजा हिरदेशाह को भयावह जंगल के बीच में नर्मदा नदी के किनारे एक स्थान पसंद आया। उन्होंने इस स्‍थान पर मोतीमहल का निर्माण कार्य शुरू करवा दिये। मोतीमहल के निर्माण के पश्‍चात राजा हिरदेशाह ने चौरागढ़ तथा गढ़ा से हटाकर रामनगर में राजधानी स्थापित किये।

राजा हिरदेशाह एक संगीतज्ञ भी थे। दिल्लीे के शाही दरबार में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान ही हिरदेशाह को शहंशाह की एक शहजादी/राजकुमारी से प्रेम हो गया। इस मुगल शहजादी को भी संगीत का अच्छा ज्ञान था। राजा हिरदेशाह ने मुगल शहजादी से विवाह करके अपनी राजधानी रामनगर ले आये और उनके रहने के लिए वर्तमान ग्राम चौगान में स्थित बेगम महल का निर्माण कराये थे। बेगम महल की संरचना मुगल कालीन इमारतों जैसी है तथा इसके अंदर एक बड़ा स्नानागार भी बनाया गया है।

रामनगर में राजा हिरदेशाह द्वारा निर्मित मोतीमहल, विष्णु मंदिर तथा रामनगर से करीब २ किलोमीटर दूर दलबादल(खेल महल) एवं बेगम महल स्थित है। इनके अलावा भी इस क्षेत्र में बहुत से गुमनाम गोंड कालीन महलों के अवशेष विद्यमान हैं। राजा हिरदेशाह गढ़ा के नजदीक गंगासागर जलाशय का निर्माण कराये और अनके कुएं व बावलियाें का निर्माण कराये। कहा जाता है कि उन्होंने अकाल के समय 12 वर्षों तक कर/टैक्‍स माफ कर दिये थे। राजा हिरदेशाह के शासनकाल में प्रजा सुखी थी। वे 44 वर्ष तक शासन किये।

रामनगर गढ़ कैसे पहुंचें

मण्‍डला जिला मुख्‍यालय के पूर्व दिशा में करीब 18 किलोमीटर की दूरी में नर्मदा नदी के किनारे स्थित है। मण्‍डला-डिंडौरी राज्‍यमार्ग पर करीब 14 किलोमीटर की दूरी तय करने पर एक सड़क मार्ग रामनगर के लिए विभक्‍त होता है। यहां से रामनगर करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर है। इसके अलावा राष्‍ट्रीय राजमार्ग-30 में स्थित ग्राम पदमी से रामनगर करीब 10 किलोमीटर तथा राष्‍ट्रीय राजमार्ग-30 में स्थित ग्राम अंजनिया से 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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मण्‍डला गढ़

मण्‍डला गढ़ का इतिहास

रामनगर के राजा केसरी शाह की षड़यंत्र पूर्वक हत्या अपने ही वंश के हरिसिंह के द्वारा करवा दी गई। परंतु हरिसिंह राजा नहीं बन सका। दिवंगत राजा केसरी शाह के मंत्री के आदेश के अनुसार हरिसिंह से युद्ध हुआ और इस युद्ध में हरिसिंह की मृत्यु हो गई। हरिसिंह का पुत्र पहाड़सिंह सत्‍ता हासिल करने के लिए प्रयास जारी रखा। राजा केसरी शाह की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र नरेंद्र शाह, जिनकी आयु उस समय मात्र 7 वर्ष की थी, मंत्री रामकिशन बाजपेयी ने गंगाधर बाजपेयी को शाही दरबार भेजकर मुगल बादशाह औरंगजेब से बालक नरेंद्रशाह को राजा बनाने के लिए मान्यता पत्र हासिल कर लिये और औपचारिकताओं के बाद उन्हें सन् 1691 में गढ़ा राज्य का राजा घोषित कर दिया गया। इस समझौते में बादशाह औरंगजेब को वर्तमान सागर जिले में स्थित धामोनी, हटा, शाहगढ़, गढ़ाकोटा और देवास जिले में स्थित मडि़यादो नामक 5 गढ़ों को दिया गया।

राजा नरेंद्रशाह के राज्‍यकाल में बहुत से आक्रमण और विद्रोह हुए। रामनगर का किला में सुरक्षा दीवार या दुर्ग के न होने की वजह से सुरक्षित नहीं था। सिर्फ एक ओर नर्मदा नदी का किनारा ही सुरक्षा कवच के रूप में था। यह किला अन्‍य किलों की तरह उंची पहाड़ी पर न होकर समतल जमीन में बनाई गई है। इन सभी कारणों से राजा नरेंद्रशाह ने राजधानी रामनगर से हटाकर मण्डला में स्थापित करना पड़ा। मण्डला के किले का निर्माण नर्मदा और बंजर नदी के संगम के पास में किया गया जहां पर लगभग तीनों ओर से नर्मदा के जल प्रवाह के कारण प्राकृतिक सुरक्षा मिल रही थी तथा दक्षिण की तरफ खाई खुदवा दिया गया। खाई खुदवाने से नर्मदा नदी की जल-धारा विभाजित होकर इस खाई में से होकर प्रवाहित होने लगी। सन् 1698 के आस-पास मण्डला का यह किला राजा नरेंद्रशाह के द्वारा बनवाया गया था।

पहाड़सिंह की मृत्यु के पश्चात उनके दो पुत्रों ने मुगल सल्तनत में जाकर इस्लाम धर्म अपना लिया। इन दोनों के नाम अब्दुल रहमान तथा अब्दुल हाजी हो गये। अब्दुल रहमान और अब्दुल हाजी को गढ़ा मण्डला राज्य को जीतने के लिए मुगल सेना की सहायता मिल गई। इन्होंने मण्डला राज्य पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण को विफल करने के लिए राजा नरेंद्र शाह को बख्त बुलंद शाह तथा राजा छत्रसाल बुंदेला की सहायता लेनी पड़ी। बख्त बुलंदशाह ने राजा छत्रसाल की सैन्य सहायता आने के पूर्व ही युद्ध में अब्दुल रहमान तथा अब्दुल हाजी को परास्त कर दिया। इस युद्ध में अब्दुल रहमान तथा अब्दुल हाजी मारे गए। इस सहायता के बदले में बख्त बुलंदशाह को 3 तथा राजा छत्रसाल बुंदेला को 5 गढ़ दिये गये।

मण्डला का अंतिम गोंड शासक राजा नरहरिशाह थे। गोंड साम्राज्य के अंत होने के बाद सन् 1781 में संपूर्ण गढ़ा मण्डला का राज्य सागर के मराठा शासकों के अधीन हो गया। मण्डला के इसी राजमहल में शंकरशाह और रघुनाथ शाह का जन्म हुआ था। मराठा शासकों के बाद मण्डला किले में अंग्रेजों ने 24 मार्च 1818 कब्जा कर लिया और 1947 में भारत देश की आजादी प्राप्‍त हाेने तक अंग्रेजी शासन के अधीन रहा।

मण्‍डला गढ़ कैसे पहुंचें

मण्‍डला जिला मुख्‍यालय से दक्षिण में करीब 1 किलोमीटर दूर नर्मदा-बंजर नदी के संगम पर स्थित है। किले के भग्‍नावशेष ही वर्तमान में विद्यमान हैं। किला परिसर में राजा नरेंद्रशाह द्वारा बनवाये गए 18 भुजाओं वाली दुर्गा देवी की राजराजेश्‍वरी मंदिर आज भी मौजूद है।

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लांजीगढ़

लांजीगढ़ का इतिहास

लांजीगढ़ राज्य से राजा यादवराय के गढ़ा राज्य और मरावी राजवंश की उत्पत्ति माना जा सकता है। लांजीगढ़ में कलचुरि राजाओं का शासन था। कलचुरि शासकों के बाद लांजीगढ़ गोंड शासक के अधीन हुआ और कलचुरी शासक रतनपुर में राजधानी स्थापित किये। लांजीगढ़ के गोंड शासक के राज्य की सीमाओं का विस्तार वर्तमान जबलपुर क्षेत्र तक था। यादवराय एक पराक्रमी युवक था। इस वजह से लांजीगढ़ राज्य में यादवराय को अपनी सेवाऐं देने का अवसर प्राप्त हुआ। यादवराय को गढ़ा क्षेत्र में तैनात किया गया। यहां पर यादवराय को राज-कौशल सीखने का पर्याप्त अवसर मिला। समय बीतता गया और यादवराय राजकार्य में निपुण होते गये। इन गुणों से प्रभावित होकर राजा ने अपनी कन्या का विवाह यादवराय से कर दिया और गढ़ा क्षेत्र को भेंट स्वरूप प्रदान किया। यादवराय ने सर्वे पाठक को मंत्री नियुक्त कर उनकी सहायता से गढ़ा में अपनी राजधानी स्थापित किए। इस तरह राजा यादवराय ने गढ़ा राज्य की नींव रखी तथा उनके राजवंश की शुरूआत हुई।

राजा यादवराय के द्वारा गढ़ा राज्य की नींव रखने के संबंध में किवदंतियां हैं। उनमें से एक मंडला के नागवंशी राजा धानू शाह/धानू पंडा की पुत्री से विवाह कर राज्य प्राप्त करने के संबंध में तथा दूसरा अमरकंटक तीर्थ यात्रा के दौरान स्‍वप्‍न में मां नर्मदा द्वारा गढ़ा राज्य की स्‍थापना सर्वे पाठक की सहायता से रखने के संबंध में हैं।

लांजी में एक विशाल किला के भग्नावशेष मौजूद हैं। यह किला मुख्य शहर से लगा हुआ है तथा इसका विस्ता़र करीब 16 एकड़ जमीन तक बताया जाता है। किले के चारों ओर खाई अथवा तालाब खुदवाकर सुरक्षित किया गया था। यहां पर कलचुरी, यादव, राजपूत और गोंड़ शासकों ने शासन किया है। किला परिसर में महामाया का भव्य मंदिर स्थित है। किले के निर्माण में पत्थरों तथा ईंटों का इस्तेमाल किया गया है। कुछ दीवारों पर देवी-देवताओं के पत्थर पर उकेरी गई प्रतिमाऐं लगी हुईं हैं। किला परिसर में एक बहुत पुराना कनक-चंपा का पेड़ भी लगा हुआ है।

लांजीगढ़ कैसे पहुंचें

लांजी बालाघाट जिले की एक तहसील है। बालाघाट जिला मुख्यालय से लांजी करीब 61 किलोमीटर दूर मध्‍यप्रदेश-छत्तीसगढ़ राज्‍य की सीमा के करीब स्थित है। लांजी तहसील छत्तीसगढ़ राज्य से लांजी-खैरागढ़ सड़क मार्ग तथा महाराष्ट्र राज्‍य से लांजी-सोगलपुर-अमगांव सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।

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