गोंडवाना साम्राज्य का इतिहास

मध्य भारत के गोंडवाना साम्राज्य का इतिहास बहुत प्राचीन है। इस साम्राज्य की नींव दूसरी शताब्दीे में रखी गई। इस साम्राज्य में बहुत से महान वीर राजाओं के साथ-साथ वीरांगनाएं भी हुईं जो भारतवर्ष के इतिहास में अपने उपलब्धियों एवं बलिदानों के लिये जाने जाते हैं। इस समय मध्य भारत के राज्यों में सुख एवं समृद्धि थी। राजाओं द्वारा प्रजा और व्यापारियों पर अनावश्यक कर नहीं लगाये जाते थे। युद्ध और जीविका उपार्जन कार्यों में पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं की भी अहम भागीदारी होती थी। इन सारे वजहों से सभी वर्गों के नागरिकों का जीवन यापन करना आसान था। गोंडवाना साम्राज्य में अलग-अलग वंश के स्वतंत्र गोंड राजाओं के राज्य थे। जिनमें से राजा यादवराय के वंश का राज्यकाल सर्वाधिक समय तक रहा।

वर्तमान बालाघाट जिले में लांजी नामक एक तहसील है। करीब 1800 वर्ष पहले यहां एक राजा शासन करते थे। लांजीगढ़ राज्य की सीमाएें उत्तर दिशा में गढ़ा (वर्तमान जबलपुर जिला) तक थीं। दक्षिण भारत से एक पराक्रमी योद्धा लांजीगढ़ आया। उस योद्धा का नाम यादवराय था। यादवराय लांजीगढ़ राज्य में अपनी सेवायें देने लगा। यादवराय को गढ़ा में तैनात किया गया। यादवराय बहुत पराक्रमी था और राजकार्य में भी कुशल था। यादवराय के पराक्रम और योग्यता देखकर लांजीगढ़ के राजा बेहद प्रभावित हुए। राजा ने अपनी पुत्री का विवाह यादवराय से करने का निश्चय किया। यादवराय का विवाह लांजीगढ़ के राजा की पुत्री से हो गया। विवाह के पश्चात लांजीगढ़ के राजा ने यादवराय को गढ़ा क्षेत्र भेंट स्वरूप प्रदान किये। अब यादवराय राजा बन चुके थे। उन्होंने गढ़ा को राजधानी बनाकर स्वयं का राज्य प्रारंभ किये। इस तरह गढ़ा राज्य और राजा यादवराय मरावी/मड़ावी के राजवंश की शुरूआत हुई।

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